Introduction to The Indian Constitution
(भारतीय संविधान का परिचय)  (Important Question & Answers)

Introduction to The Indian Constitution (भारतीय संविधान का परिचय)  विषय – सूची इकाई-1 संवैधानिक पूर्ववृत्त और भारतीय संविधान का निर्माण इकाई-II भारतीय संविधान में आधारभूत तत्त्व इकाई-III मूल अधिकार इकाई –IV                                                                                राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत इकाई – V पाठ-1 : प्रधानमंत्री पाठ 2: संसद पाठ-3 :न्यायपालिका इकाई – VI पाठ-1 : केंद्र – राज्य संबंध पाठ-2 : विकेन्द्रीकरण Watch full Content:-https://shorturl.at/4iOFM Contact For Best PDF Notes : 84487 31058(WhatsApp)   प्रश्न 1.भारतीय संविधान की मूलभूत विशेषताओं का वर्णन कीजिए। उत्तर- भारत के संविधान को 26 नवम्बर 1949 को अपनाया गया । अर्थात्, इस दिन संविधान सभा ने इसे अंतिम रूप दिया । लेकिन यह दो महीने बाद यानि 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। हालांकि संविधान के कुछ प्रावधान जैसे नागरिकता चुनाव, अस्थायी संसद एवं अन्य संबंधित प्रावधान 26 नवंबर 1949 को ही लागू हो गए थे। दो महीने बाद अर्थात 26 जनवरी 1950 को इसे इसलिए लागू किया गया था, क्योंकि इसी दिन यानि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की आजादी का उत्सव मनाया था । यह अध्याय भारतीय संविधान की सरंचना के महत्वपूर्ण बिन्दुओं से संबंधित है। लिखित संविधान भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है। भारत का संविधान एक संविधान सभा ने एक निश्चय समय तथा योजना के अनुसार बनाया था इसलिए यह लिखित संविधान है इस दृष्टिकोण से भारतीय संविधान, अमेरिकी संविधान के समुतुल्य है। जबकि ब्रिटेन और इजराइल का संविधान अलिखित है। विस्तृत संविधान भारत का संविधान दुनिया में सबसे विस्तृत संविधान है क्योंकि भारतीय संविधान में विभिन्न प्रावधानों को काफी सहज तरीके से विस्तृत रूप में लिखा गया है, ताकि संविधान का पालन करने के दौरान शासन प्रशासन को अधिक कठिनाइयों का सामना ना करना पड़े। यही कारण है कि मूल रूप से भारतीय संविधान में कुल 395 अनुच्छेद ( 22 भागों में विभाजित) और 8 अनुसूचियाँ थी, किंतु विभिन्न संशोधनों के परिणामस्वरूप वर्तमान में इसमें कुल 448 अनुच्छेद (25 भागों में विभाजित) और 12 अनुसूचियां हैं।एच. वी. कामथ नेइसकी विशालता के सम्बन्ध में कहा था, “हमें इस बात का गर्व है कि हमारा संविधान विश्व का सबसे विशालकाय संविधान है। ” लचीलेपन और कठोरता का मिश्रण भारतीय संविधान लचीलेपन और कठोरता का मिश्रण हैं। भारतीय संविधान के लचीले होने का अर्थ यह है कि भारतीय संविधान के कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जिन्हें भारतीय संसद साधारण बहुमत के माध्यम से संशोधित कर सकती है। उदाहरण के लिए, राज्यों के नाम, राज्यों की सीमा इत्यादि । कठोर संविधान:-संविधान के कठोर होने का अर्थ यह है कि इस संविधान के कुछ ऐसे प्रावधान भी हैं, जिन्हें संशोधित करना भारतीय संसद के लिए आसान नहीं होता है। इन प्रावधानों के लिए न सिर्फ संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है, बल्कि देश के आधे राज्यों के विधान मंडल के समर्थनकी आवश्यकता भी होती है। देश की संघीय व्यवस्था से संबंधित तमाम प्रावधान इसी प्रक्रिया के माध्यम से संशोधित किए जा सकते हैं। इस प्रकार भारतीय संविधान लचीलेपन और कठोरता का सुंदर मिश्रण है । एकल नागरिकता भारत का संविधान देश के प्रत्येक व्यक्ति को एकल नागरिकता प्रदान करता है। भारत में कोई भी राज्य किसी अन्य राज्य के वासी होने के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। इसके अलावा, भारत में, किसी भी व्यक्ति को देश के किसी भी हिस्से में जाने और कुछ स्थानों को छोड़कर भारत की सीमा के भीतर कहीं भी रहने का अधिकार है। समाजवादी राज्य समाजवादी अर्थात यह अपने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करता है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भारत सभी रूपों में शोषण के खिलाफ है और अपने सभी नागरिकों के लिए आर्थिक न्याय में विश्वास रखता है। मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य, संविधान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं। वे अधिकार जो लोगों के जीवन के लिये अति आवश्यक या मौलिक समझे जाते हैं उन्हें मूल अधिकार (fundamental rights) कहा जाता है। भारतीय संविधान के भाग- III में निहित, मौलिक अधिकार भारत के संविधान द्वारा प्रदान किये गए बुनियादी मानवाधिकार है। छह मौलिक अधिकारों में समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के खिलाफ अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार और संवैधानिक उपचार का अधिकार शामिल हैं। मौलिक कर्तव्‍य:- हर नागरिक का यह कर्तव्‍य है कि वह संविधान का पालन करे व उसके आदर्शों, संस्‍थाओं, राष्‍ट्र ध्‍वज और राष्‍ट्रगान का आदर करे। स्‍वतंत्रता के लिए हमारे राष्‍ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्‍च आदर्शों को ह्रदय में संजोए रखे तथा पालन करे। भारत की प्रभुता एकता, और अखंडता की रक्षा करे। सरकार का संसदीय स्वरूप भारत में सरकार का संसदीय स्वरूप है। भारत में दो सदनों – लोकसभा और राज्य सभा,वाली विधायिका है। सरकार के संसदीय स्वरूप में, विधायी और कार्यकारिणी अंगों की शक्तियों में कोई स्पष्ट अंतर नहीं है। भारत में, सरकार का मुखिया प्रधानमंत्री होता है। भारतीय संविधान – संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्य भारतीय संविधान की प्रस्तावना में घोषित किया गया है कि भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्य होगा। इसका अर्थ है कि भारत की सरकार किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय दबाव के अंतर्गत कार्य नहीं करेगी। भारत की सरकार भारत के हित से संबंधित निर्णय लेने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र होगी। कोई भी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था या संगठन या अन्य देश की सरकार भारत पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं बना सकती है। गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली की स्थापना संविधान की प्रस्तावना में गणराज्य की स्थापना का संकल्प व्यक्त किया गया है। गणराज्य का तात्पर्य ऐसे राज्य से है जिसमें शासन का प्रधान आनुवंशिक न होकर जनता द्वारा निर्वाचित हो। हमारे शासन का सर्वोच्च पदाधिकारी राष्ट्रपति होता है, उसका निर्वाचन जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि करते हैं। अत: भारत में सदियों से चली आ रही राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली को समाप्त करके गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली की स्थापना की गई है। संघात्मक शासन की स्थापना भारत 28 राज्यों का एक संघ है। भारत “में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया है। इस हेतु तीन सूचियाँ बनाई गई हैं-संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त है। केन्द्र तथा राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों के समाधान की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान की गई

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